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प्रयागराज में मियावाकी जंगल सृजित करने को 237 स्थानों का हुआ चयन

प्रयागराज, 29 मई (हि.स.)। केन्द्र व प्रदेश सरकार लगातार पर्यावरण संरक्षण करने का प्रयास कर रहें है। इसी अभियान को मजबूत करने के तहत जंगल सृजित करने का अभियान भी चलाया जा रहे है। अभियान के तहत प्रयागराज में मियावाकी पद्धति से जंगल सृजित करने के लिए 237 स्थानों का चयन किया गया है। यह जानकारी गुरुवार को प्रयागराज मनरेगा विभाग के उपश्रमायुक्त गुलाब चन्द्र ने दी।

उन्होंने बताया कि प्रयागराज जनपद में पौध रोपण अभियान को और मजबूत करने के लिए सभी विकास खंडों से ऐसे स्थलों को चिन्हित किया जा रहा है कि जहां हरित आवरण को तैयार किया जा सके। शासन की मंशा अनुसार सभी विकास खंडों से जंगल तैयार करने वाले सरकारी जमीन को खोजने का निर्देश दिया गया था। अभियान के तहत पूरे जनपद में 237 स्थानों का चयन हो चुका है जहां मियावाकी जंगल सृजित करने का कार्य किया जाएगा।

जाने मियावाकी वृक्षारोपण विधि के प्रयोग का क्या है उद्देश्य

उन्होंने बताया कि इस पद्धति से बहुत कम समय में जंगलों को घने जंगलों में परिवर्तित किया जा सकता है। यह कार्यविधि 1970 के दशक में विकसित की गई थी, जिसका मूल उद्देश्य भूमि के एक छोटे से टुकड़े के भीतर हरित आवरण को सघन बनाना था। इस कार्यविधि में पेड़ स्वयं अपना विकास करते हैं और तीन वर्ष के भीतर वे अपनी पूरी लंबाई तक बढ़ जाते हैं। मियावाकी पद्धति में उपयोग किये जाने वाले पौधे ज़्यादातर आत्मनिर्भर होते हैं और उन्हें खाद एवं जल देने जैसे नियमित रख-रखाव की आवश्यकता नहीं होती है।

जाने इस पद्धति क्या है महत्व

स्थानीय वृक्षों का घना हरा आवरण उस क्षेत्र के धूल कणों को अवशोषित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है जहाँ उद्यान स्थापित किया गया है। साथ ही पौधे सतह के तापमान को नियंत्रित करने में भी मदद करते हैं। इन वनों के लिये उपयोग किये जाने वाले कुछ सामान्य स्थानीय पौधों में अंजन, अमला, बेल, अर्जुन और गुंज शामिल हैं। ये वन नई जैव-विविधता और एक पारिस्थितिकी तंत्र को प्रोत्साहित करते हैं जिससे मृदा की उर्वरता में वृद्धि होती है।

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