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गौरीकुंड से केदारनाथ तक पैदल मार्ग पर बढ़ रहा भूस्खलन

रुद्रप्रयाग, 30 मार्च (हि.स.)। वर्ष 1991 में भू-वैज्ञानिकों ने आगाह कर दिया था कि केदारनाथ क्षेत्र में भारी व अधिक निर्माण शुभ नहीं है। केदारनाथ मंदिर क्षेत्र को सीमित रखने और आसपास भारी निर्माण नहीं करने की सलाह दी गई थी। साथ ही मंदाकिनी नदी के दाई तरफ रामबाड़ा से रुद्रा प्वाइंट क्षेत्र को एवलांच जोन बताते हुए वहां किसी भी प्रकार के निर्माण न करने पर जोर दिया गया था, बावजूद बीते साढ़े तीन दशक में केदारपुरी बदल चुकी है। आपदा के बाद भी यहां भारी निर्माण पर रोक नहीं लग सकी है। हालात यह हैं कि यह पूरा क्षेत्र भूस्खलन व भूधंसाव की चपेट में है, जो कभी भी किसी बड़ी अनहोनी का कारण बन सकता है।

जीएसआई के वैज्ञानिक दीपक श्रीवास्तव ने अपनी टीम के साथ वर्ष 1991 से 1994 तक केदारनाथ मंदिर और आसपास के क्षेत्रों का गहन सर्वेक्षण किया था। उन्होंने चार वर्ष तक यहां प्रत्येक मौसम में यहां के हालातों का गहन अध्ययन करते हुए मौसम के हिसाब से यहां निर्माण व आवास व्यवस्था की बात कही थी। तब, उन्होंने ऑन इंटीग्रेटेड आइस, स्नो एवलांच जियोलॉजिकल स्टडीज इन मंदाकिनी वैली अराउंड केदारनाथ, डिस्टि्रक्ट चमोली, उत्तर प्रदेश, नाम से एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि केदारनाथ मंदिर के आसपास निर्माण कार्य सही नहीं है। साथ ही जो कार्य हो रहा है, उसे भी रोकने की सलाह दी गई थी।

रिपोर्ट में कहा गया था कि केदारनाथ समुद्रतल से 3581 मीटर की ऊंचाई पर होने के साथ ही तीन तरफ से पर्वतों और हिमखंड जोन से घिरा है। साथ ही केदारनाथ क्षेत्र मंदाकिनी व सरस्वती नदी के मध्य में संकरे हिस्से में बसा है, जिस कारण यहां किसी भी प्रकार का निर्माण सुरक्षित नहीं है। बावजूद, जीएसआई की रिपोर्ट को दरकिनार कर यहां उत्तराखंड राज्य निर्माण तक काफी बड़े पैमाने पर निर्माण हो चुके थे। जून 2013 की आपदा में यहां 150 आवासीय भवन मंदाकिनी नदी के सैलाब में ध्वस्त हो गए थे, जबकि इतने ही भवनों को भारी क्षति पहुंची थी। केदारनाथ पुनर्निर्माण के नाम पर यहां बीते एक दशक से निर्माण कार्य चल रहे हैं। निर्माण कार्य में भारी मशीनों का उपयोग हो रहा है, जो हिमालय क्षेत्र के लिए शुभ नहीं है। भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि, केदारनाथ की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हल्का निर्माण होना चाहिए, पर ऐसा नहीं हो रहा है। हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विवि श्रीनगर गढ़वाल के पर्यावरण विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष व वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. यशपाल सुंदरियाल बताते हैं कि केदारनाथ से मंदाकिनी नदी ढलान पर बहती है, जिससे उसका वेग तेज हो जाता है। ऐसे में नदी के बहाव से भू-कटाव हो रहा है, जिससे स्थिति प्रतिवर्ष बिगड़ रही है।

जगह-जगह दरक रहा केदार व पैदल मार्ग

रुद्रप्रयाग। जून 2013 की आपदा के बाद से केदारनाथ क्षेत्र में भूस्खलन का दायरा निरंतर बढ़ रहा है। एमआई-26 हेलीपैड के ऊपरी तरफ से लेकर भैरवनाथ मंदिर क्षेत्र तक भूस्खलन होने लगा है। वहीं, मंदाकिनी नदी के दूसरी तरफ गरुड़चट्टी तक भूस्खलन का दायरा बढ़ चुका है, जो शुभ नहीं है। रामबाड़ा से केदारनाथ तक पैदल मार्ग के नीचे मंदाकिनी नदी के तेज बहाव से कटाव हो रहा है, जिसका असर रास्ते पर भूस्खलन व भूधंसाव के रूप में देखने को मिल रहा है।

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