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(बॉलीवुड के अनकहे किस्से) याद नहीं रहा वह जूली ब्यॉय

आज से 50 साल पहले 18 मार्च 1975 को एक फिल्म रिलीज हुई थी जूली। अपने सुमधुर संगीत और नए हीरो-हीरोइन के बोल्ड रोमांटिक दृश्यों के कारण देखते-देखते यह फिल्म युवाओं के दिल में उतर गई। फिल्म का संगीत दिया था राजेश रोशन ने और हीरो थे विक्रम। दक्षिण भारतीय हीरोइन लक्ष्मी की यह पहली ही फिल्म थी। भारत में रह रहे एंग्लो इंडियन परिवारों की स्थिति पर बनी इस पहली फिल्म में श्रीदेवी बाल कलाकार के रूप में थीं। इतनी सफल फिल्म करने के बाद भी विक्रम हिंदी सिनेमा में हीरो के रूप में लंबी पारी नहीं खेल पाए। हालांकि इसके बाद 1977 में आई उनकी दो फिल्में “आदमी सड़क का” और “स्वामी” हिट रहीं थीं। बाद में वह ज्यादातर फिल्मों में सहयोगी नायक या विलेन के रूप में नजर आए। हाल ही में अद्विक पब्लिकेशन से एक पुस्तक “बंबई 421 मील” आई है जिसे प्रदीप गुप्ता ने लिखा है और सब टाइटल में इसे विक्रम मकानदार जूली ब्यॉय की आत्मकथा लिखा गया है। बातचीत शैली में लिखी इस पुस्तक से हम जूली ब्यॉय उर्फ मोइनुद्दीन उर्फ विक्रम मकानदार के बारे में कुछ रोचक जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं।

विक्रम का मूल नाम मोइनुद्दीन मकानदार है। उनका जन्म महाराष्ट्र और कर्नाटक के बॉर्डर पर स्थित हुबली के पास स्थित गदग में 31 मई 1947 को हुआ। उनके पिता हुबली में एक बेकरी चलाते थे। वे अपने 11 भाई- बहनों में सबसे बड़े थे। कन्नड़ भाषी लेकिन हिंदी फिल्मों के जबरदस्त शौकीन विक्रम साइंस से ग्रेजुएशन के बाद आगे बेकरी की पढ़ाई बेंगलुरु में कर रहे थे लेकिन तभी उन्हें फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया यानी एफटीआईआई से अभिनय कोर्स के लिए इंटरव्यू का पत्र आ गया। यह फॉर्म फिल्म की दीवानगी के चलते उन्होंने घरवालों को न बताकर भरा था और पता अपने दोस्त का दिया था। उनका इंटरव्यू मद्रास में होना था। वह ट्रेन से वहां पहुंचे। हजारों युवाओं की भीड़ थी। उनके इंटरव्यू में दक्षिण फिल्म जगत के दिग्गज के रामा राव, प्रकाश राव, एवीएम, जैमिनी, वासन बैठे हुए थे।

एवीएम के पूछने पर कि वे फिल्मों में क्यों आना चाहते हैं पर उन्होंने एक लंबा चौड़ा भाषण दिया जिसका लब्बो लुबाब था कि मैं बचपन से ही फिल्मों का दीवाना हूं, मैं सिनेमा के लिए ही बना हूं, मैं सिनेमा ही ओढ़ता और बिछाता हूं , मैं इसके बिना नहीं रह सकता…। जैसे ही वह रुके तो उन्हें बोर्ड के सभी लोग ताली बजाते हुए मिले। अंत में स्क्रीन टेस्ट के लिए उनका और एक लड़की महालक्ष्मी का चयन हुआ। अंत में उनका चुनाव हुआ। उनके दोस्तों के साथ उन्हें भी यह जिज्ञासा थी कि उन्हें थियेटर या अभिनय का कोई भी बुनियादी अनुभव न होने के बाद भी उनका चुनाव कैसे हो गया। तब अभिनय विभाग के प्रमुख रोशन तनेजा ने उन्हें बताया था कि उनको केवल इसलिए चुना गया था क्योंकि अगर किसी व्यक्ति को रंगमंच पर काम का अनुभव है तो उसे अपने सांचे में ढालना मुश्किल है, जबकि जीरो से किसी व्यक्ति को अभिनय में ढालना कहीं आसान है। तुम्हें इंटरव्यू के समय दिए गए भाषण के कारण ही चुना गया।

बांद्रा के एक गेस्ट हाउस से विक्रम ने संघर्ष की शुरुआत की। 1967 में पहला रोल मनोज कुमार के सहयोगी कलाकार के रूप में ‘पत्थर के सनम’ में वाणी गणपति के साथ मिला । छोटे-छोटे रोल मिलते रहे लेकिन हीरो के रूप में काम 1973 में ‘प्यासी नदी’ में मिला। लेकिन उनकी बतौर हीरो सफल होने वाली फिल्म 1975 में आई ‘जूली’ थी। लेकिन शीर्ष पर टिके रहने का तिलिस्म शायद वे नहीं ढूंढ पाए। उनकी आखिरी फिल्म 2008 में रिलीज हुई “तुलसी” थी। इसमें उनकी भूमिका मंदिर के स्वामी की थी, फीमेल लीड में मनीषा कोइराला थी। इरफान खान इस फिल्म में विलेन बने थे। यह तेलुगू की हिट फिल्म “मातृ देवी भव” का रीमेक थी। बाद में विक्रम फिल्म वितरण और निर्माण के क्षेत्र में भी उतरे, नसरुद्दीन शाह और स्मिता पाटिल को लेकर ‘सितम’ बनाई, इसका विषय अलग हटकर था। इसमें पहली बार जगजीत सिंह को संगीत देने के लिए अवसर मिला था। बहुत कम बजट में बनी इस फिल्म ने अच्छा व्यवसाय किया। विक्रम चार से भी अधिक दशकों से शो व्यवसाय में सक्रिय हैं। चालीस से अधिक फिल्मों में अभिनय किया, एक फिल्म भी बनाई। इवेंट मैनेजमेंट का कार्य बड़े-बड़े कारपोरेट के लिए किया। विक्रम इन दिनों भी काफी सक्रिय हैं, वे फिल्म निर्माण में सलाहकार की भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा वितरण का काम भी करते हैं। बॉलीवुड टूर्स नाम की एक संस्था चला रहे हैं।

चलते-चलते

विक्रम ने हीरो के रूप में अपनी पहली फिल्म तो साइन कर ली थी लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि इसका असली निर्माता कौन है। शूटिंग का पहला शेड्यूल गुजरात में था, फिल्म की कास्ट और क्रू को बताया गया कि फ्लाइट से लोकेशन पर ले जाया जाएगा। एयरपोर्ट पहुंचने पर पता चला कि फ्लाइट भी कोई ऐसी वैसी नहीं थी, यह चार्टर फ्लाइट थी। जब फ्लाइट उतरी तो उसके स्वागत में परंपरागत गुजराती वेशभूषा में एक सज्जन खड़े हुए थे, यही कोई दो-ढाई किलो सोने के जेवर से लदे हुए। पता चला कि यह सुखर नारायण बखिया था, जो उस समय देश का सबसे बड़े सोने के तस्कर हुआ करता था। उसने पूरी कास्ट और क्रू को लगभग धमकाते हुए ठीक से काम करने को कहा। वहां उसकी अपनी जबरदस्त हथियारबंद निजी सिक्योरिटी थी। विक्रम की कार में दो हथियारबंद लोग तैनात कर दिए गए। ऐसी ही हालत हीरोइन वाणी गणपति की थी। अगले दिन शूटिंग शुरू हुई। खुद निर्माता सुखर नारायण बखिया वहां मौजूद था। विक्रम के ऊपर शॉट फिल्माया जाना था, कैमरा रोल हुआ। लेकिन डर के कारण उनकी हालत इतनी खराब थी कि डायलाग तक न बोला गया।

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