बस्तर-चित्रकोट की कुडूक मछुआ समिति को मिला राज्य अलंकरण

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बस्तर-चित्रकोट की कुडूक मछुआ समिति को मिला राज्य अलंकरण

बस्तर-चित्रकोट के कुड़ूक मछुआ समिति को 3 नवंबर 2026 को राज्य अलंकरण से नवाज़ा गया, जो न केवल समिति के अथक प्रयासों की मान्यता है, बल्कि स्थानीय मछली पकड़ने की परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का भी प्रतीक है। इस पुरस्कार के माध्यम से राज्य सरकार ने ग्रामीण समाज के उन लोगों को सम्मानित किया है, जो सदीयों से नदियों और जलीय जीवों के साथ संतुलित सहअस्तित्व का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। समिति के सदस्यों ने इस सम्मान को गर्व से स्वीकार किया और भविष्य में और अधिक विकास के लिए आशा जताई।

कुड़ूक मछुआ समिति: परंपरागत मछली पकड़ने की विरासत

कुड़ूक मछुआ समिति बस्तर-चित्रकोट के कुड़ूक क्षेत्र में 1975 से सक्रिय है। यहाँ के मछुआ अपने हाथ से बने जाल, बाँस के जाल और पारंपरिक विधियों से मछली पकड़ते हैं। समिति ने नदियों के जल स्तर और जल गुणवत्ता पर निगरानी रखकर जलीय जीवों की आबादी को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2024 में समिति ने जल संरक्षण के लिए एक पहल शुरू की, जिससे नदियों का जल स्तर 12% बढ़ा। इस प्रकार, समिति ने न केवल मछली पकड़ने के कौशल को संरक्षित किया, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को भी सुनिश्चित किया।

राज्य अलंकरण का महत्व और चयन मानदंड

राज्य अलंकरण, जिसे “राज्य सम्मान” भी कहा जाता है, उन व्यक्तियों और समूहों को दिया जाता है जो समाज के कल्याण में उल्लेखनीय योगदान देते हैं। चयन समिति ने समिति के 50 वर्षों के कार्यकाल, मछली पकड़ने के पारंपरिक तरीकों के संरक्षण, और जल संरक्षण पहल को प्रमुख मानदंडों के रूप में माना। समिति के प्रमुख, सुश्री राधा देवी ने कहा, “यह सम्मान हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देता है और हमारे काम की वैधता को मान्यता देता है।”

समिति के प्रमुख सदस्यों और उनके अनुभव

समिति के अध्यक्ष, रामकृष्ण शुक्ला, 60 वर्ष के हैं और उन्होंने 30 वर्षों से मछली पकड़ने का काम किया है। उन्होंने बताया, “हमारी पीढ़ियों ने नदियों के साथ एक समरसता भरा संबंध विकसित किया है। यह पुरस्कार हमें यह याद दिलाता है कि हमारा काम समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण है।” समिति के अन्य प्रमुख सदस्यों ने भी अपने अनुभव साझा किए, जैसे कि पारंपरिक जाल बनाने की कला और जल प्रबंधन की सूक्ष्म रणनीतियाँ।

भविष्य के लिए योजनाएँ और सामाजिक प्रभाव

समिति ने इस पुरस्कार के बाद आने वाले वर्ष में तीन प्रमुख परियोजनाएँ शुरू करने की योजना बनाई है। पहली परियोजना है “कुड़ूक मछुआ शिक्षा कार्यक्रम”, जिसमें युवा पीढ़ी को पारंपरिक मछली पकड़ने के तरीकों और जल संरक्षण के बारे में शिक्षित किया जाएगा। दूसरी परियोजना है “सतत मछली पालन” कार्यक्रम, जिसमें मछली पालन के लिए जैविक और पर्यावरण अनुकूल तरीकों को अपनाया जाएगा। तीसरी परियोजना है “समुदाय आधारित पर्यटन” पहल, जिससे कुड़ूक क्षेत्र को एक पर्यावरणीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सके। इन योजनाओं से न केवल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपरा को भी संरक्षित किया जा सकेगा।

निष्कर्ष

राज्य अलंकरण प्राप्त करके बस्तर-चित्रकोट की कुड़ूक मछुआ समिति ने न केवल अपने कार्य की मान्यता पाई, बल्कि यह भी दिखाया कि पारंपरिक कौशल और पर्यावरण संरक्षण एक साथ चल सकते हैं। यह पुरस्कार एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि कैसे ग्रामीण समाज की परंपरागत प्रथाएँ और आधुनिक विकास के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है। समिति के सदस्यों और राज्य सरकार के बीच यह सहयोग आगे चलकर क्षेत्रीय विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करेगा।