तीन सौ साल प्राचीन मंदिर से जुड़ी है श्रद्धालुओं की आस्था
कानपुर, 01 अप्रैल (हि.स.)। देशभर में चैत्र नवरात्रि का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। इन दिनों में देवी मां के अलग-अलग स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा अर्चना की जाती है। वैसे तो शहर में देवी की कई मंदिर स्थापित है। इनमें से एक बंगाली मोहाल स्थित करीब तीन सौ साल प्राचीन मां काली देवी का मंदिर भी है। यहां पर भक्त अपनी मनोकामना लेकर मंदिर प्रांगण में ताला बांधते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद ताले को खोल दिया जाता है। इस मंदिर से जुड़े कई रहस्य भी है। जिसे लेकर पुजारी रविंद्र नाथ बनर्जी ने मंगलवार कई अहम जानकारियां साझा की है।
वैसे तो औद्योगिक नगरी कानपुर शहर कई विशेषताओं के लिए देश भर में जाना जाता है लेकिन के बंगाली माहौल स्थित करीब 300 साल प्राचीन मां काली देवी का मंदिर भी स्थापित है। इस मंदिर में पहुंचने के लिए तंग गलियों से होकर गुजरना पड़ता है। इस मंदिर में रोजाना भक्तों का तांता लगा रहता है। नवरात्रि के दिनों में यहां पर विशेष तौर पर भीड़ कई गुना बढ़ जाती है। जहां मां के दर्शन करने के लिए भर के समय से ही भक्त अपनी बारी का इंतजार करते हुए घंटा लाइनों में लगे रहते हैं।
मंदिर के पुजारी रविंद्र नाथ बनर्जी ने मंदिर के इतिहास को लेकर बताया कि प्राचीन समय में एक महिला श्रद्धालु रोजाना माता रानी के दर्शन करने के लिए आई थी। आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान महिला श्रद्धालु रोजाना मां के सामने बैठकर घंटे रोया करती थी। एक दिन वह मंदिर प्रांगण में ताला लगने लगी। ऐसा करते देख उस समय के पुरोहित ने उससे पूछा कि तुम ऐसा क्यों कर रही हो? तो उसने बताया कि मेरे सपने में मां ने दर्शन देते हुए कहा था कि ताला बांधने से तुम्हारी मनोकामना पूर्ण हो जाएगी। कुछ दिनों बाद उसने दीवार पर लिखा पाया कि उसकी मनोकामना पूरी हो गयी है। उसके बाद फिर दोबारा वह महिला कभी दिखाई नही दी।
यही कारण है कि आज भी यह परंपरा सदियों से चली जा रही है। जो भी भक्त सच्चे मन से मन से मनोकामना मांगते हुए मंदिर प्रांगण में ताला बांधता है। तो उसकी मनोकामना जरुर पूरी होती है। आज भी मंदिर प्रांगण में हजारों की संख्या में ताले बंधे हुए दिखाई देते हैं। साथ ही किसी भक्त द्वारा लगाया ताला नही मिलता है तो वह उस तले की चाबी मां के चरणों मे अर्पित कर देता है।