संत ईश्वर के सम्मान में 2 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के राजपथ पर एक भव्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस समारोह में हजारों श्रद्धालु, धर्मगुरु, राजनेता और आम जनता ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य संत के उपदेशों और उनके द्वारा प्रसारित शांति, सहिष्णुता और समाजिक समरसता के संदेश को याद करना तथा आज के समाज में उसकी प्रासंगिकता को पुनः स्थापित करना था। इस कार्यक्रम को राज्य के प्रमुखों और प्रमुख धार्मिक संगठनों के सहयोग से आयोजित किया गया, जिसमें संत के जीवन के प्रमुख अंशों को याद किया गया और उनके कार्यों की प्रशंसा की गई।
संत के जीवन की प्रेरणादायक यात्रा और शिक्षाएँ
संत ईश्वर, जिन्हें ‘सत्य और करुणा के प्रतीक’ के रूप में जाना जाता है, ने अपने जीवन में सामाजिक असमानता, धार्मिक भेदभाव और आर्थिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया। उनकी शिक्षाओं का मुख्य केंद्र बिंदु था ‘सभी मनुष्यों का समान अधिकार’ और ‘आत्मिक शुद्धि के माध्यम से समाज सुधार’। कार्यक्रम में संत के गुरु, शिष्य और उनके परिवार के सदस्य ने संत के जीवन के प्रमुख घटनाओं को याद करते हुए उनके आदर्शों की प्रशंसा की। संत के उपदेशों के अनुसार, आज के युग में भी सहिष्णुता और सहानुभूति के मूल्यों को अपनाना आवश्यक है, जिससे समाज में शांति और समृद्धि बनी रहे।
प्रमुख राजनेताओं और धर्मगुरुओं की भागीदारी और भावपूर्ण भाषण
कार्यक्रम में प्रधानमंत्री, राज्यपाल, और अन्य प्रमुख राजनेताओं के साथ-साथ प्रमुख हिंदू, मुस्लिम, सिख, बौद्ध और जैन धर्मगुरुओं ने भाग लिया। प्रधानमंत्री ने संत के उपदेशों के आधुनिक समाज में महत्व पर प्रकाश डाला और कहा कि “संत ईश्वर के संदेश से हम एक समावेशी और न्यायसंगत समाज की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।” इसके अलावा, एक प्रमुख बौद्ध भिक्षु ने संत के ‘करुणा और दया’ के मूल्यों की प्रशंसा करते हुए यह संदेश दिया कि धर्मों के बीच संवाद और समझदारी को बढ़ावा देना ही वास्तविक शांति की कुंजी है।
कार्यक्रम के दौरान आयोजित सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियाँ
संत के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में धार्मिक भजन, मंत्रोच्चार, और संत के उपदेशों पर आधारित नाट्य प्रस्तुति का आयोजन किया गया। एक विशेष ‘संत ईश्वर स्मृति पुस्तक’ भी प्रकाशित की गई, जिसमें संत के जीवन की प्रमुख घटनाएँ, उद्धरण और उनके शिष्यों के अनुभव शामिल हैं। कार्यक्रम के दौरान एक ‘शांति रैली’ भी आयोजित की गई, जहाँ प्रतिभागियों ने संत के नाम पर एकजुट होकर शांति और समरसता के लिए जुलूस चलाया। इस जुलूस का अंत राजपथ के मुख्य द्वार पर एक भव्य ‘धर्मिक भेंट’ के साथ हुआ, जिसमें संत के नाम पर एक फूलों की माला अर्पित की गई।
संत ईश्वर की स्मृति को समर्पित एक नई पहल
कार्यक्रम के समापन पर, आयोजकों ने एक नई पहल की घोषणा की, जिसका उद्देश्य संत के उपदेशों को शिक्षा और समाजिक कार्यों में लागू करना है। इस पहल के अंतर्गत ‘संत ईश्वर समर्पित शैक्षणिक कार्यक्रम’ और ‘सामाजिक सेवा अभियान’ चलाए जाएँगे। यह पहल संत के आदर्शों के अनुसार समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य और समानता को बढ़ावा देने के लिए तैयार की गई है। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने संत के नाम पर एक साथ प्रार्थना की और संत के जीवन की प्रेरणा को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
निष्कर्ष
संत ईश्वर के सम्मान में आयोजित यह कार्यक्रम न केवल उनके उपदेशों और कार्यों की याद दिलाता है, बल्कि आज के समाज में सहिष्णुता, समानता और शांति के मूल्यों को पुनः जागृत करने का एक महत्वपूर्ण मंच भी बनता है। इस कार्यक्रम से स्पष्ट होता है कि संत के संदेश का समय के साथ कोई संबंध नहीं है और यह आज के युवाओं, राजनेताओं और समाज के सभी वर्गों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। संत ईश्वर के आदर्शों को आगे बढ़ाने के लिए इस नई पहल के माध्यम से शिक्षा और समाजिक कार्यों में एक नया अध्याय लिखा जाएगा, जिससे एक समावेशी और समृद्ध समाज की नींव रखी जाएगी।



