🔹 राष्ट्रपति भवन में हावड़ा के ग्रंथों का सम्मान
हावड़ा के दो विद्वानों द्वारा संकलित Howrah Rare Manuscripts को राष्ट्रपति भवन के ‘ग्रंथ कुटीर’ में स्थान मिला है।
यह सम्मान बांग्ला भाषा को ध्रुपद दर्जा मिलने के बाद और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
🔹 डॉ. श्यामल बेरा का योगदान
डॉ. श्यामल बेरा द्वारा संकलित प्राचीन पांडुलिपियां इस संग्रह का अहम हिस्सा बनी हैं।
उन्होंने लगभग 600 पृष्ठों की दुर्लभ गरुड़ पुराण पांडुलिपि Howrah Rare Manuscripts के रूप में प्रदान की है।
🔹 ऐतिहासिक और दुर्लभ ग्रंथ
बताया गया कि यह पांडुलिपि वर्ष 1861 में लिखी गई थी, हालांकि मूल ग्रंथ इससे कहीं अधिक प्राचीन है।
इस कारण Howrah Rare Manuscripts का ऐतिहासिक मूल्य अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
🔹 डॉ. विभोर दास की भूमिका
डॉ. विभोर दास ने चर्यापद, गीतांजलि और अन्य दुर्लभ ग्रंथ राष्ट्रपति भवन को सौंपे हैं।
उनका योगदान भी Howrah Rare Manuscripts को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम रहा है।
🔹 डिजिटलीकरण और संरक्षण
डॉ. बेरा के संग्रह की कई पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण पहले ही किया जा चुका है।
यह प्रयास Howrah Rare Manuscripts के संरक्षण में मददगार साबित हो रहा है।
🔹 ‘ग्रंथ कुटीर’ का महत्व
‘ग्रंथ कुटीर’ भारत की 11 ध्रुपद भाषाओं की साहित्यिक परंपरा को समर्पित है।
यह केंद्र Howrah Rare Manuscripts सहित हजारों पुस्तकों और पांडुलिपियों को संरक्षित कर रहा है।
🔹 राष्ट्रीय गौरव का विषय
राष्ट्रपति द्वारा दोनों विद्वानों को सम्मानित किया गया है।
Howrah Rare Manuscripts का यह सम्मान भारतीय संस्कृति और साहित्य के लिए गौरवपूर्ण क्षण बन गया है।




