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रिश्वत केस में पुख्ता सबूत हों तो गवाहों के मुकरने से फर्क नहीं पड़ता: राजस्थान हाईकोर्ट

रिश्वत मामले में हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

Rajasthan High Court ने रिश्वतखोरी के मामलों को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि रिश्वत मांगने और लेने के विश्वसनीय और पुख्ता सबूत मौजूद हों, तो शिकायतकर्ता या गवाहों के अपने बयानों से मुकर जाने का मामले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

कोर्ट ने यह टिप्पणी जेवीवीएनएल के एक सहायक अभियंता और उसके सहयोगी की अपील खारिज करते हुए की।

सहायक अभियंता और सहयोगी की सजा बरकरार

जस्टिस Pramil Kumar Mathur की पीठ ने पृथ्वीलाल मीणा और हेमराज की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को बरकरार रखा।

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद वॉइस रिकॉर्डिंग में शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच रिश्वत की मांग और राशि तय करने से जुड़ी बातचीत स्पष्ट रूप से दर्ज है।

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और ट्रैप कार्रवाई से साबित हुआ मामला

कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, ट्रैप कार्रवाई और बरामदगी के माध्यम से रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने को साबित कर दिया है।

अदालत के अनुसार सह-आरोपी ने सहायक अभियंता के निर्देश पर रिश्वत की राशि ली थी और वह केवल एक मिडिलमैन (मध्यस्थ) के रूप में काम कर रहा था। अदालत ने कहा कि मध्यस्थ के जरिए रिश्वत लेना भी कानूनन अपराध है।

गवाहों के मुकरने से केस खत्म नहीं होता

अपील में आरोपियों ने कहा था कि ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता अपने पुराने बयानों से मुकर गए और अभियोजन का समर्थन नहीं किया।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में कई बार दबाव, समझौते या अन्य कारणों से गवाह अपने बयान बदल लेते हैं। इसलिए अदालत को उपलब्ध सभी साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करना होता है।

ट्रैप के दौरान बरामद हुई रिश्वत राशि

शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि बिजली मीटर निरीक्षण के बाद लगाए गए जुर्माने को कम करने के लिए आरोपितों ने रिश्वत मांगी थी।

ट्रैप कार्रवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने फिनॉलफ्थेलीन पाउडर लगे 5,500 रुपये आरोपित के सहयोगी को दिए। इसके तुरंत बाद एसीबी टीम ने मौके पर पहुंचकर वही राशि बरामद कर ली।

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