संत साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
पूर्वी चंपारण में संत साहित्य सांस्कृतिक चेतना विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें कई विद्वानों ने भाग लिया।
कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा किया गया।
संत समाज में अभेद का संदेश देते हैं
कुलपति ने कहा कि संत समाज में भेद मिटाकर अभेद की भावना स्थापित करते हैं। संतों की वाणी समाज को नई दिशा देती है।
इस प्रकार संत साहित्य सांस्कृतिक चेतना का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
संत साहित्य का मूल विचार
विशेषज्ञों ने बताया कि संत साहित्य आत्मा और जीवन के गहरे प्रश्नों से जुड़ा होता है।
इसमें “मैं कौन हूं” जैसे सवालों के उत्तर मिलते हैं। इसलिए संत साहित्य सांस्कृतिक चेतना का महत्व बढ़ जाता है।
समाज सुधार में संतों की भूमिका
वक्ताओं ने कहा कि संतों ने समाज में भेदभाव को खत्म करने का प्रयास किया। उन्होंने लोक भाषा को महत्व दिया।
इससे संत साहित्य सांस्कृतिक चेतना समाज के हर वर्ग तक पहुंची।
ज्ञान और संस्कृति का संगम
संगोष्ठी में कई शोधार्थियों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में सांस्कृतिक और शैक्षणिक पहलुओं पर चर्चा हुई।



