इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 23 साल जेल में रहे हत्यारोपित को साक्ष्य के अभाव में बरी

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🔹 23 साल बाद बड़ा फैसला

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के मामले में 23 वर्ष से जेल में बंद एक व्यक्ति को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसला 23 साल बाद बरी मामले में अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका।

🔹 न्याय व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी

जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि यह मामला आपराधिक न्याय प्रणाली पर “दुखद टिप्पणी” है।

पीठ ने स्पष्ट कहा कि केवल सेमिनार और बैठकों से न्याय व्यवस्था नहीं सुधरेगी।
जजों की संख्या, सहायक स्टाफ और बुनियादी ढांचे में वास्तविक वृद्धि आवश्यक है।

🔹 बाल गवाह के बयान पर सवाल

मामले में मुख्य गवाह आरोपी का पांच वर्षीय पुत्र था।
क्रॉस एग्जामिनेशन में उसने स्वीकार किया कि उसने दूसरों के कहने पर बयान दिया।

अदालत ने भूमि विवाद और पूर्व शत्रुता को भी संदेह का आधार माना।

🔹 मेडिकल साक्ष्य भी मेल नहीं खाए

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में घाव भारी धारदार हथियार से होने की बात कही गई, जबकि अभियोजन ने साधारण चाकू का दावा किया था।

अदालत ने कथित अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति को भी अविश्वसनीय माना और सुप्रीम कोर्ट के सहादेवन बनाम तमिलनाडु राज्य मामले का हवाला दिया।

🔹 “वास्तविक पीड़ा अब शुरू होगी”

अदालत ने मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपी की असली पीड़ा अब शुरू होगी।
उसका परिवार बिखर चुका है और भविष्य अनिश्चित है।

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