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बीएचयू के वैज्ञानिकों ने खोजी वंशानुगत पौध प्रतिरक्षा, जलवायु-सहिष्णु फसलों के विकास की नई राह

बीएचयू की बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि

वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) ने कृषि विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की है। विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने पौधों में ऐसी वंशानुगत प्रतिरक्षा प्रणाली (Heritable Plant Immunity) की खोज की है, जो न केवल वर्तमान पीढ़ी को बल्कि उनकी अगली पीढ़ियों को भी रोगों से सुरक्षा प्रदान करती है।

इस शोध का नेतृत्व डॉ. प्रशांत सिंह और उनकी टीम — बंदना, निधि और थिरुनारायण — ने किया। अध्ययन को एएनआरएफ कोर रिसर्च ग्रांट (CRG) के अंतर्गत समर्थन मिला और यह प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल Plant Science (Ireland) में प्रकाशित हुआ है।


मिट्टी के सूक्ष्मजीवों से जन्मी पौध प्रतिरक्षा

टीम ने अपने अध्ययन में पाया कि मिट्टी में पाए जाने वाले लाभकारी सूक्ष्मजीव (Microbes) गेहूं के पौधों को “प्राइम” कर स्पॉट ब्लॉच रोग के प्रति प्रतिरोधक बना सकते हैं।
सबसे रोचक तथ्य यह सामने आया कि यह प्रतिरोधक क्षमता पौधों की अगली पीढ़ी (G₂) में भी बनी रही — यानी पौधों में वंशानुगत प्रतिरक्षा सक्रिय हो गई।

इन पौधों ने रोग की तीव्रता में कमी, अधिक रक्षा प्रतिक्रिया और बेहतर वृद्धि क्षमता दिखाई, यहां तक कि रोगजनक तनाव की स्थिति में भी उनका उत्पादन प्रभावित नहीं हुआ।


एपिजेनेटिक रहस्य का खुलासा

शोध में पाया गया कि यह प्रतिरक्षा डीएनए मिथाइलेशन (DNA Methylation) के जरिए नियंत्रित होती है। प्रमुख रक्षा जीन PR1 और PR3 के प्रमोटर क्षेत्रों में हुए ये परिवर्तन पौधों की “प्रतिरक्षा स्मृति (Immune Memory)” को स्थायी बनाते हैं, जो आगे की पीढ़ियों में भी स्थानांतरित हो जाती है।


सतत् कृषि की दिशा में नई सोच

डॉ. प्रशांत सिंह के अनुसार, यह खोज रासायनिक-मुक्त और पर्यावरण-अनुकूल कृषि के लिए नई संभावनाएं खोलती है।
लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सहायता से यदि यह वंशानुगत प्रतिरक्षा स्थायी रूप से विकसित की जा सके, तो भविष्य की फसलें जलवायु-सहिष्णु (Climate-Resilient) और सतत् हरित ग्रह (Sustainable Green Planet) के लक्ष्य को पूरा करने में सहायक होंगी।

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