बलिदानी ‘वंदे मातरम’ के साथ फांसी को स्वीकार कर लेते थे : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

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बलिदानी ‘वंदे मातरम’ के साथ फांसी को स्वीकार कर लेते थे : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा में बुधवार को राष्ट्रगीत वंदे मातरम की 150वीं जयंती के अवसर पर विशेष चर्चा की गई। इस दौरान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भावनात्मक और ऐतिहासिक संदर्भों के साथ अपना वक्तव्य रखा। उन्होंने कहा कि जो समाज अपने इतिहास से सीख नहीं लेता, उसका भविष्य बर्बाद हो जाता है

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, बलिदान और आत्मसम्मान का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह गीत व्यक्ति को निजी भावना से ऊपर उठाकर सार्वजनिक और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ता है।

“वंदे मातरम के साथ बलिदानी फांसी चढ़ गए”

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अनेकों बलिदानी ‘वंदे मातरम’ का उद्घोष करते हुए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए। यह गीत उनके लिए साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा आधार था।

उन्होंने कहा कि आज इस अवसर पर सभी महापुरुषों को स्मरण करना प्रत्येक देशवासी का कर्तव्य है, क्योंकि इन्हीं के बलिदान से आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले पा रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी का जताया आभार

मुख्यमंत्री साय ने संसद में राष्ट्रगीत की 150वीं जयंती पर चर्चा कराए जाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह गौरवगाथा केवल इतिहास नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।

तुष्टिकरण की राजनीति पर टिप्पणी

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि कांग्रेस को तुष्टिकरण करना था, इसलिए तत्कालीन सरकारों ने वंदे मातरम का उपयोग तो किया, लेकिन इसे तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि जन्मभूमि की प्रशंसा के लिए राष्ट्रगीत के केवल कुछ अंश ही अपनाए गए, क्योंकि कुछ वर्गों को इससे आपत्ति थी।

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि वंदे मातरम किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि मातृभूमि की आराधना का प्रतीक है और इसे पूरे सम्मान के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए।

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