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मेरठ के फुटबॉल सिलाई उद्योग में अब नहीं हो रही है बाल मजदूरी

नई दिल्ली, 22 मार्च (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के मेरठ में फुटबॉल सिलाई उद्योग से अब बाल मजदूरी नहीं हो रही है। इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन (आईसीपी) की एक रिपोर्ट के अनुसार मेरठ के 94 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उनके आस-पड़ोस में फुटबॉल की सिलाई करने वाली इकाइयों में बाल मजदूरी का एक भी मामला नहीं देखा गया। इससे संकेत मिलता है कि देश के सबसे बड़े फुटबॉल निर्माण केंद्रों में से एक मेरठ के फुटबॉल सिलाई उद्योग में बाल मजदूरी का अंत करीब है। अध्ययन में केवल पांच प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्होंने इन इकाइयों में बच्चों को मजदूरी करते हुए देखा है।

देश के 416 जिलों में जमीन पर काम कर रहे 200 से भी ज्यादा नागरिक समाज संगठनों के देशव्यापी नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) के सहयोगी इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन ने यह शोध जेआरसी के सहयोगियों ग्रामीण समाज विकास केंद्र और जनहित फाउंडेशन की मदद से किया।

अध्ययन के निष्कर्षों का स्वागत करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा कि यह हमारे लिए एक बेहद अहम उपलब्धि और मील का पत्थर है। फुटबॉल सिलाई उद्योग से बाल श्रम लगभग समाप्त होने की कगार पर है। यह सफलता सरकारों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और इस अपराध के खिलाफ एकजुट हितधारकों के सामूहिक प्रयासों से संभव हुई है।

फुटबॉल सिलाई उद्योग में बाल मजदूरी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। 1990 के दशक के अंत और 2000 के शुरुआती वर्षों की रिपोर्टों में खास तौर से उत्तर प्रदेश के मेरठ और पंजाब के जालंधर में इस उद्योग में बड़े पैमाने पर बच्चों के शोषण की खबरें सामने आई थीं। 2008 के एक अध्ययन में मेरठ में फुटबॉल सिलाई से जुड़े कार्यों में बड़े पैमाने पर बाल श्रम और बच्चों के शोषण को उजागर करते हुए कहा गया था कि इसमें काम कर रहे बच्चों को कठिन परिस्थितियों में दिन-रात खटाया जाता था।

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