डीयू पुस्तक चर्चा कार्यक्रम में प्रोफेसरों और विद्यार्थियों के बीच एक जीवंत संवाद का मंच तैयार हुआ, जहाँ साहित्यिक और शैक्षणिक दृष्टिकोणों का संगम हुआ। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य न केवल पाठ्यपुस्तक के गहन अध्ययन को प्रोत्साहित करना था, बल्कि छात्रों में आलोचनात्मक सोच और शोध के प्रति रुचि जगाना भी था। 28 अक्टूबर 2026 को डीयू के मुख्य परिसर में आयोजित इस चर्चा में 12 प्रोफेसर और 150 से अधिक छात्र भाग लिए, जिन्होंने अपनी-अपनी दृष्टि से विषय की व्याख्या की।
पुस्तक चयन: विषयगत गहराई और समकालीन प्रासंगिकता और विस्तार
इस चर्चा का आधार चुनी गई पुस्तक “समीक्षा: भारत की सामाजिक संरचना” थी, जिसे प्रोफेसर राजीव कुमार ने प्रस्तावित किया था। पुस्तक में सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं का विश्लेषण किया गया है, जो वर्तमान भारत की स्थिति को समझने के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। पुस्तक चयन समिति ने विभिन्न शैक्षणिक क्षेत्रों से सुझाव लेकर इस पुस्तक को चुना, ताकि पाठक विभिन्न दृष्टिकोणों से विषय को देख सकें। इस चयन के पीछे यह सोच थी कि पुस्तक में प्रस्तुत विचार छात्रों को समाज के समग्र ढाँचे को समझने में मदद करेंगे, जिससे वे अपनी शोध परियोजनाओं में इसे समाहित कर सकें।
प्रोफेसर का दृष्टिकोण: शिक्षण में नवाचार और आलोचनात्मक सोच
प्रोफेसर राजीव ने चर्चा की शुरुआत पुस्तक के मुख्य बिंदुओं के संक्षिप्त अवलोकन से की। उन्होंने बताया कि कैसे शिक्षण में नवाचार के लिए साहित्यिक उदाहरणों का उपयोग किया जा सकता है। प्रोफेसर ने छात्रों को प्रोत्साहित किया कि वे पुस्तक के कथनों पर प्रश्न उठाएँ और वैकल्पिक व्याख्याएँ प्रस्तुत करें। उन्होंने आलोचनात्मक सोच के महत्व पर जोर देते हुए यह भी बताया कि शोध के दौरान स्रोतों की विश्वसनीयता का आकलन करना कितना आवश्यक है। इस दृष्टिकोण से, प्रोफेसर ने छात्रों को यह सिखाया कि ज्ञान केवल पुस्तक से नहीं, बल्कि अनुभव और विश्लेषण से भी प्राप्त होता है।
विद्यार्थियों की भागीदारी: प्रश्नोत्तर सत्र और विचार-विमर्श और अभिव्यक्ति
विद्यार्थियों ने सत्र के दौरान सक्रिय रूप से प्रश्न पूछे, जैसे कि “क्या सामाजिक संरचना में बदलाव के बावजूद कुछ मूलभूत मानदंड स्थिर रहते हैं?” और “पुस्तक में प्रस्तुत आंकड़ों की वैधता कैसे सुनिश्चित की जाए?” इन प्रश्नों के उत्तर में प्रोफेसरों ने गहन चर्चा की, जिससे छात्रों को समग्र दृष्टिकोण मिला। प्रश्नोत्तर सत्र के बाद एक खुला विचार-विमर्श हुआ, जहाँ विद्यार्थियों ने अपने शोध विषयों पर चर्चा की और सहपाठियों से प्रतिक्रिया ली। इस प्रक्रिया में छात्रों ने अपनी लेखन और प्रस्तुति कौशल को भी निखारा, जिससे उनकी अभिव्यक्ति क्षमता में वृद्धि हुई।
साक्षात्कार: प्रोफेसर व छात्रों के अनुभव और भविष्य की योजनाएँ
कार्यक्रम के अंत में एक छोटा साक्षात्कार आयोजित किया गया, जिसमें प्रोफेसर और कुछ प्रमुख छात्रों ने अपने अनुभव साझा किए। प्रोफेसर ने बताया कि इस चर्चा से उन्हें छात्रों के बीच बढ़ती जिज्ञासा और शोध के प्रति समर्पण दिखाई दिया। एक छात्र ने कहा, “इस कार्यक्रम ने मुझे अपने शोध विषय के प्रति नया दृष्टिकोण दिया और मुझे गहरी समझ मिली।” दोनों पक्षों ने भविष्य में ऐसे कार्यक्रमों को नियमित रूप से आयोजित करने का प्रस्ताव रखा, ताकि शैक्षणिक संवाद और ज्ञान का आदान-प्रदान निरंतर बना रहे।
निष्कर्ष
डीयू की यह पुस्तक चर्चा न केवल साहित्यिक ज्ञान को बढ़ावा देती है, बल्कि छात्रों में आलोचनात्मक और नवाचारी सोच को भी प्रोत्साहित करती है। प्रोफेसरों और विद्यार्थियों के बीच खुली बातचीत ने शैक्षणिक संवाद को नया आयाम दिया। ऐसे कार्यक्रम भविष्य में शैक्षणिक संस्थानों के लिए मॉडल बन सकते हैं, जहाँ ज्ञान का आदान-प्रदान और शोध की प्रेरणा को एक साथ बढ़ावा दिया जाता है।


