परंपरागत धारा-नौलों के संरक्षण और पुनरुद्धार पर राज्य स्तरीय तकनीकी कार्यशाला में सर्रा की अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी कहकशां नसीम और यूकॉस्ट के महानिदेशक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. दुर्गेश पंत ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस कार्यशाला का उद्देश्य न केवल धारा-नौलों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को उजागर करना था, बल्कि उन्हें वैज्ञानिक और वास्तुशिल्प दृष्टिकोण से संरक्षित एवं पुनर्जीवित करने के व्यावहारिक तरीकों का विकास भी करना था।
पारंपरिक धारा-नौलों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामाजिक भूमिका
धारा-नौले, जिन्हें प्राचीन भारतीय जल प्रबंधन प्रणालियाँ कहा जाता है, नदियों, झीलों और खेतों को आपस में जोड़ते थे। ये नालें कृषि, घरेलू उपयोग और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अनिवार्य थीं। इतिहासकारों के अनुसार, इन नालों की बुनियाद 5वीं शताब्दी से ही तैयार की गई थी, जो समाज के जल संरक्षण और सामुदायिक समन्वय को दर्शाती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से धारा-नौलों का निदान और मूल्यांकन
कहकशां नसीम ने कार्यशाला में धारा-नौलों के भू-तकनीकी विश्लेषण पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मिट्टी के प्रकार, भू-जल स्तर और नालों की संरचनात्मक अखंडता का मूल्यांकन करने के लिए सॉफ्टवेयर मॉडलिंग का उपयोग किया जाता है। इससे यह पता चलता है कि कौन-सी नालें जल प्रवाह में बाधा डाल रही हैं और कौन-सी नालें पुनःस्थापना के लिए उपयुक्त हैं।
वास्तुशिल्प संरक्षण के लिए नवीन तकनीकें
डॉ. दुर्गेश पंत ने धारा-नौलों के पुनरुद्धार हेतु 3D प्रिंटिंग और बायो-डिग्रेडेबल सामग्री के प्रयोग के उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने दिखाया कि कैसे पारंपरिक पत्थर और ईंटों के साथ आधुनिक सुदृढ़ीकरण तकनीकों को मिलाकर नालों को मजबूत बनाया जा सकता है। साथ ही, उन्होंने स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षण देने के कार्यक्रम की योजना भी साझा की।
सामुदायिक सहभागिता और नीति निर्माण
कार्यशाला के दौरान, नसीम और पंत ने बताया कि सफल संरक्षण के लिए स्थानीय निवासियों, पंचायतों और जल संरक्षण बोर्डों को एकजुट करना आवश्यक है। उन्होंने एक नीति ढांचा प्रस्तावित किया जिसमें धारा-नौलों के संरक्षण को राज्य के जल प्रबंधन योजनाओं में शामिल किया जाए और आर्थिक प्रोत्साहन के तहत स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया जाए।
निष्कर्ष
इस राज्य स्तरीय तकनीकी कार्यशाला ने पारंपरिक धारा-नौलों के वैज्ञानिक, वास्तुशिल्प और सामाजिक महत्व को पुनः स्थापित किया। कहकशां नसीम और डॉ. दुर्गेश पंत के नेतृत्व में, नालों के संरक्षण के लिए नवीनतम तकनीकें और सामुदायिक सहभागिता को एक साथ लाया गया। यह पहल न केवल जल संसाधनों के संतुलन को सुनिश्चित करेगी, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में भी एक नया अध्याय लिखेगी।



