गोबर के दीपकों से रोशन होगी देश-विदेश की दीपावली

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गोबर के दीपकों से रोशन होगी देश-विदेश की दीपावली

दिसंबर की ठंडी हवा में जब दीपों की रोशनी जगमगाने लगती है, तो इस वर्ष की दीपावली में एक नया रंग भरेगा। गोबर के दीपकों से रोशन होने वाली यह परंपरा पर्यावरण के प्रति जागरूकता को बढ़ाती है और ग्रामीण समुदायों के लिए नई आर्थिक संभावनाएँ खोलती है। सरकार और गैर‑सरकारी संगठनों के मिलजुल कर चलाए गए कार्यक्रमों से यह पहल देश-विदेश में एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गई है।

भारत और विदेश में गोबर दीपक से दीपावली का नया रूप

गोबर से बने दीपक, जिन्हें ‘गौदीपक’ भी कहा जाता है, अब भारत के साथ-साथ विदेशों में भी सजाए जा रहे हैं। पेरिस, न्यूयॉर्क, टोक्यो जैसी बड़ी शहरों में भारतीय दूतावासों ने इस पहल को अपनाया है, जिससे विदेश में रहने वाले भारतीयों को भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का नया अनुभव मिलता है। इस दीपक का रंग और आकार पारंपरिक लालटेन से अलग, प्राकृतिक और सादगीपूर्ण है, जो त्योहार के माहौल में एक ताज़ा तड़का लगाता है।

पर्यावरण के लिए लाभ: कार्बन फुटप्रिंट घटाने का उपाय

गोबर के दीपक जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड और हानिकारक गैसों का उत्सर्जन पारंपरिक पेट्रोलियम आधारित दीपकों की तुलना में कम होता है। इसके अलावा, गोबर एक नवीकरणीय स्रोत है, जो पशुपालन के कचरे को उपयोगी बनाने का एक अच्छा तरीका है। इस पहल के तहत, भारत सरकार ने ‘ग्रीन दीपावली’ अभियान के तहत १० लाख गोबर दीपकों की आपूर्ति सुनिश्चित की है, जिससे वर्षा में ५०,००० टन CO₂ के बराबर उत्सर्जन में कमी की उम्मीद है।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव: ग्रामीण समुदायों को मिलेगी नई रोशनी

गांवों में गोबर दीपक बनाने के लिए मजदूरों को प्रशिक्षण दिया गया है, जिससे उन्हें स्थायी आय का स्रोत मिला है। विशेषकर महिलाओं और युवाओं को यह कार्यशालाएँ सशक्त बनाती हैं। गोबर दीपकों की बिक्री से ग्रामीण इलाकों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, और साथ ही गोबर के कचरे को उपयोगी बनाने से पशुपालन के कचरे का प्रबंधन भी बेहतर हो रहा है। इस प्रकार, पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक समृद्धि भी प्राप्त हो रही है।

सरकार और एनजीओ की भूमिका: प्रचार-प्रसार और प्रशिक्षण कार्यक्रम

प्रधानमंत्री के नेतृत्व में ‘ग्रीन दीपावली’ अभियान के तहत, केंद्र सरकार ने एनजीओ के साथ मिलकर ५०० से अधिक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए हैं। इन केंद्रों में ग्रामीण युवाओं को गोबर दीपक बनाने की तकनीक सिखाई जा रही है। साथ ही, सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर जागरूकता अभियान चलाकर, लोगों को इस पर्यावरण‑मित्र दीपक के उपयोग के महत्व से अवगत कराया जा रहा है। इस सहयोग से गोबर दीपकों की मांग में लगातार वृद्धि हो रही है।

निष्कर्ष

गोबर के दीपकों से रोशन होने वाली दीपावली न केवल पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी को दर्शाती है, बल्कि ग्रामीण समुदायों के लिए नई आर्थिक संभावनाएँ भी खोलती है। यह पहल दिखाती है कि परंपरा और नवाचार को मिलाकर हम अपने त्योहारों को अधिक हरित, समावेशी और सशक्त बना सकते हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए दीपावली को और भी उज्ज्वल और पर्यावरण‑स्नेही बनाने के इस प्रयास को हम सभी को अपनाना चाहिए।