भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री । फोटो – फाइल

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भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री । फोटो - फाइल

पहला पैराग्राफ

भारतीय विदेश नीति के नए युग की शुरुआत 3 नवंबर 2026 को हुई जब विदेश सचिव के पद पर विक्रम मिस्री को नियुक्त किया गया। मिस्री, जो 2023 में विदेश मंत्रालय में वरिष्ठ पद पर थे, अपनी विशिष्ट कूटनीतिक कौशल और रणनीतिक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। उनकी नियुक्ति ने भारत को वैश्विक मंच पर नई ऊर्जा और स्पष्ट दिशा प्रदान की है। यह कदम भारत की विदेश नीति में निरंतरता और नवाचार दोनों को दर्शाता है, जिससे देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को मजबूती मिलेगी।

विक्रम मिस्री का करियर पथ

मिस्री ने 1990 के दशक के मध्य में भारतीय राजनयिक सेवाओं में प्रवेश किया। उन्होंने कई महत्वपूर्ण दूतावासों में कार्य किया, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ के प्रमुख देशों में कूटनीतिक पद शामिल हैं। 2015 में, उन्होंने भारत के विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ उप सचिव के रूप में कार्य किया, जहाँ उन्होंने व्यापार, निवेश और सुरक्षा मुद्दों पर नीतिगत दिशा-निर्देश तैयार किए। 2022 में, उन्हें विदेश मंत्रालय के मुख्य सचिव के रूप में नियुक्त किया गया, जहाँ उन्होंने भारत की विदेश नीति को समेकित और वैश्विक चुनौतियों के प्रति लचीला बनाने में अहम भूमिका निभाई। उनकी कूटनीतिक रणनीतियाँ अक्सर बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित रही हैं, जिससे भारत को वैश्विक मंच पर एक सम्मानित और विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्थापित किया गया।

नई विदेश नीति की दिशा

मिस्री की नई विदेश नीति के तहत, भारत ने “स्मार्ट सोल्यूशंस” के सिद्धांत को अपनाया है। इसमें तकनीकी नवाचार, डिजिटल कूटनीति और सतत विकास को प्रमुखता दी गई है। उनके नेतृत्व में, भारत ने “डिजिटल इंडिया” के तहत डिजिटल कूटनीति के लिए विशेष कार्यबल गठित किया, जिससे देश की साइबर सुरक्षा और डेटा प्रबंधन क्षमताएँ बढ़ीं। इसके अलावा, मिस्री ने “सतत विकास लक्ष्यों” (SDGs) को विदेश नीति के केंद्र में रखकर पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर वैश्विक सहयोग को बढ़ावा दिया। यह दिशा भारत को एक अग्रणी और जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

वैश्विक मंच पर भारत का उभरता प्रभाव

मिस्री के कार्यकाल में, भारत ने विश्व मंच पर अपनी भूमिका को तेज़ी से बढ़ाया है। उन्होंने पेरिस समझौते, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यता के लिए भारत की मांग को मजबूत किया और वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर चर्चाओं में सक्रिय भाग लिया। इसके अलावा, मिस्री ने “भारत-आफ्रिका शिखर सम्मेलन” और “भारत-यूरोप रणनीतिक संवाद” जैसी पहलें शुरू कीं, जिससे भारत के भू-राजनीतिक संबंधों में विविधता और गहराई आई। उनकी कूटनीति ने भारत को दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और मध्य पूर्व के बीच एक मध्यस्थ और पुल के रूप में स्थापित किया, जिससे क्षेत्रीय शांति और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा मिला।

भविष्य की चुनौतियाँ और अवसर

मिस्री के नेतृत्व में, भारत को अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना है। क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में असमानताएँ प्रमुख मुद्दे हैं। इसके अलावा, भारत को डिजिटल विभाजन, साइबर सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटना होगा। लेकिन ये चुनौतियाँ नए अवसर भी लेकर आती हैं। मिस्री की नीति के तहत, भारत को नवाचार, शिक्षा और शोध में निवेश बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इससे भारत को वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अग्रणी स्थान प्राप्त करने में मदद मिलेगी, साथ ही नई तकनीकों के विकास के माध्यम से रोजगार सृजन और सामाजिक समृद्धि को बढ़ावा मिलेगा।

निष्कर्ष

विक्रम मिस्री की नियुक्ति भारतीय विदेश नीति के लिए एक नया अध्याय खोलती है। उनकी रणनीतिक दृष्टि और बहुपक्षीय कूटनीति से भारत वैश्विक मंच पर अपनी पहचान और प्रभाव को और सुदृढ़ करेगा। भविष्य की चुनौतियों के बावजूद, मिस्री के नेतृत्व में भारत नवाचार, सतत विकास और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए तैयार है। यह नया युग भारतीय कूटनीति को अधिक गतिशील, समावेशी और प्रभावी बनाएगा, जिससे भारत का विश्व में एक विश्वसनीय और जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थान मजबूत होगा।