उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन मंगलवार को श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के दूसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए

0
22
उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन मंगलवार को श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के दूसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने मंगलवार को श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के दूसरे दीक्षांत समारोह में भावनात्मक एवं प्रेरणादायक संबोधन दिया। इस कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के मुख्यालय, मणिपाल में हुआ, जहाँ 300 से अधिक स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों ने अपनी कड़ी मेहनत के फलस्वरूप डिग्री प्राप्त की। उपराष्ट्रपति के शब्दों ने उपस्थित सभी को नई ऊर्जा और उत्साह से भर दिया, विशेषकर उन छात्रों को जिनका लक्ष्य संस्कृत भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में आगे बढ़ना है।

उपराष्ट्रपति की प्रेरणादायक संबोधन ने दीक्षार्थियों को प्रोत्साहित किया

राधाकृष्णन ने अपने भाषण में छात्रों के प्रयासों की सराहना करते हुए बताया कि आज के डिजिटल युग में भी संस्कृत जैसी प्राचीन भाषा का महत्व और बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, “सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढ़ाने के लिए हमें नई सोच और नई तकनीक की आवश्यकता है।” इस दृष्टिकोण ने छात्रों को यह विश्वास दिलाया कि वे अपने ज्ञान को समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए उपयोग कर सकते हैं। उपराष्ट्रपति ने यह भी उल्लेख किया कि विश्वविद्यालय के शोध केंद्रों और पुस्तकालयों में उपलब्ध संसाधन छात्रों को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाते हैं।

शास्त्री विश्वविद्यालय का सांस्कृतिक और शैक्षणिक योगदान

विश्वविद्यालय ने पिछले वर्ष में संस्कृत साहित्य, व्याकरण, दर्शन और आयुर्वेद में शोध कार्यों को प्रोत्साहित किया। इसके अलावा, शास्त्री विश्वविद्यालय ने कई अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों और कार्यशालाओं का आयोजन किया, जिससे भारतीय संस्कृति को विश्व स्तर पर मान्यता मिली। विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और शोधकर्ता अब कई अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में प्रकाशन कर रहे हैं, जो कि भारतीय शैक्षणिक मानदंडों को ऊँचा उठा रहा है। उपराष्ट्रपति ने यह भी बताया कि विश्वविद्यालय का दृष्टिकोण “सर्वांगीण शिक्षा” पर आधारित है, जिससे छात्रों को समग्र रूप से विकसित होने का मौका मिलता है।

छात्रों के भविष्य के लिए संस्कृत का महत्व

राधाकृष्णन ने संस्कृत के अध्ययन को सिर्फ एक शैक्षणिक विषय नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि संस्कृत में निहित तर्क और विश्लेषणात्मक सोच आज के डेटा-चालित विश्व में अत्यंत उपयोगी है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि संस्कृत की सहायता से भारतीय संस्कृति के मूल्यों को पुनर्जीवित किया जा सकता है, जिससे युवा पीढ़ी में राष्ट्रीय पहचान की भावना जागृत होती है। उपराष्ट्रपति ने छात्रों को प्रोत्साहित किया कि वे अपने शोध कार्यों को समाज के हित में उपयोग करें और संस्कृत के माध्यम से नई तकनीकी नवाचारों पर काम करें।

समाज में संस्कृत की पुनरुत्थान की दिशा

उपराष्ट्रपति ने समाज में संस्कृत की भूमिका को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और मोबाइल ऐप्स के माध्यम से संस्कृत सीखने की प्रक्रिया को सरल और आकर्षक बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृत का अध्ययन करके युवा पीढ़ी भारतीय संस्कृति के प्रति गर्व महसूस करेगी और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय मूल्यों को प्रस्तुत करने में सक्षम होगी।

निष्कर्ष

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन का संबोधन एक प्रेरणादायक संदेश लेकर आया, जिसने न केवल दीक्षार्थियों के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए संस्कृत के महत्व को उजागर किया। शास्त्री विश्वविद्यालय की उपलब्धियों और उपराष्ट्रपति के दृष्टिकोण ने यह स्पष्ट किया कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा है जो आज के युवा मन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में सक्षम है। इस कार्यक्रम से यह स्पष्ट हुआ कि शिक्षा, संस्कृति और नवाचार के संगम से ही भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिलेगी।