रमज़ान के आख़िरी अशरे में बढ़ी इबादत की रौनक
बिहार के Bhagalpur में रमज़ान मुबारक के बरकत भरे महीने का आख़िरी अशरा शुरू होते ही मस्जिदों में इबादत करने वालों की संख्या बढ़ गई है।
रमज़ान आख़िरी अशरा एतिकाफ़ के तहत बड़ी संख्या में मोमिन मस्जिदों में एतिकाफ़ में बैठकर शबे क़द्र की अज़ीम नेमत हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।
शाही जामा मस्जिद में एतिकाफ़ का माहौल
शहर के Shahi Jama Masjid Khalifabagh में भी दो दर्जन से अधिक लोग एतिकाफ़ में बैठे हैं।
मस्जिद का माहौल इन दिनों बेहद रूहानी और नूरानी नजर आ रहा है, जहां दिन-रात इबादत, तिलावत और दुआ का सिलसिला जारी है।
सुन्नत-ए-नबवी की परंपरा
इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार Prophet Muhammad रमज़ान के आख़िरी अशरे में दुनियावी कामों से अलग होकर मस्जिद में एतिकाफ़ किया करते थे।
उसी सुन्नत की पैरवी करते हुए आज भी दुनिया भर की मस्जिदों में एतिकाफ़ का एहतमाम किया जाता है।
एतिकाफ़ की रूहानी अहमियत
खानकाह पीर दमड़िया शाह के सज्जादा नशीन Syed Shah Fakhre Alam Hasan ने कहा कि एतिकाफ़ इंसान को अल्लाह के क़रीब करता है और उसके दिल में रूहानियत और तक़वा पैदा करता है।
उन्होंने कहा कि माद्दापरस्ती के इस दौर में जो लोग दुनियावी व्यस्तताओं से अलग होकर एतिकाफ़ करते हैं, वे काबिल-ए-मुबारकबाद हैं।
चार सौ साल पुरानी मस्जिद की परंपरा
ख़लीफ़ाबाग की शाही जामा मस्जिद लगभग 400 साल पुरानी ऐतिहासिक मस्जिद है। यहां हर दौर में एतिकाफ़ की परंपरा निभाई जाती रही है और आज भी यह रिवायत जारी है।
शबे क़द्र की तलाश में इबादत
इस्लाम में शबे क़द्र को बहुत अहम रात माना जाता है।
क़ुरआन शरीफ़ के अनुसार यह रात हज़ार महीनों से बेहतर मानी जाती है। इसलिए रमज़ान के आख़िरी अशरे में मोमिन खास तौर पर इबादत, क़ुरआन की तिलावत, ज़िक्र और नफ़्ल नमाज़ों में मशगूल रहते हैं।
रूहानियत से भर जाता है माहौल
रमज़ान के आख़िरी दिनों में मस्जिदों में मुतक़िफ़ीन की मौजूदगी से पूरा माहौल रूहानियत से भर जाता है।
देर रात तक क़ुरआन की तिलावत, दुआ और इबादत का सिलसिला चलता रहता है, जिससे नौजवानों और आम लोगों में भी दीन और इबादत के प्रति रुझान बढ़ता है।



