पश्चिम बंगाल की राजनीति में सिंगूर एक ऐसा नाम है, जिसने सत्ता परिवर्तन की कहानी लिखी, लेकिन आज खुद विकास की बाट जोह रहा है। टाटा मोटर्स की नैनो फैक्ट्री के खिलाफ हुए आंदोलन ने 2011 में राज्य की राजनीति पलट दी, मगर इसके बाद सिंगूर की तस्वीर नहीं बदली।
🔥 आंदोलन जिसने सत्ता बदली
2006–08 के दौरान टाटा मोटर्स के लिए जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हुए आंदोलन ने पूरे राज्य में हलचल मचा दी थी। इसकी अगुवाई तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने की थी।
किसानों की जमीन, जबरन अधिग्रहण और उद्योग बनाम कृषि की बहस ने लोगों को आंदोलित कर दिया। यही आंदोलन वाम मोर्चा की सत्ता के अंत और तृणमूल के उदय की नींव बना।
🏭 टाटा के जाने से बदली औद्योगिक छवि
आंदोलन के बाद टाटा मोटर्स को पश्चिम बंगाल छोड़कर गुजरात जाना पड़ा। इससे बंगाल की औद्योगिक छवि को बड़ा झटका लगा। निवेशकों के बीच यह संदेश गया कि राज्य में उद्योग लगाना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है।
😔 आंदोलन के नायक भी अब निराश
सिंगूर के पूर्व विधायक रवींद्रनाथ भट्टाचार्य और कई स्थानीय नेता आज मानते हैं कि आंदोलन के बाद सरकार ने सिंगूर को नजरअंदाज कर दिया।
न उद्योग आया, न जमीन को पूरी तरह कृषि योग्य बनाया गया। रोजगार के अवसर खत्म हो गए और अर्थव्यवस्था ठहर गई।
❓ राजनीति बनाम विकास
विडंबना यह है कि जिन लोगों ने कभी फैक्ट्री का विरोध किया, वही अब कह रहे हैं कि अगर टाटा की फैक्ट्री होती तो इलाके में व्यापार, दुकानें और नौकरियां होतीं।
🏛️ फिर चर्चा में सिंगूर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्तावित दौरे से सिंगूर फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। भाजपा इसे तृणमूल सरकार की विफलता का प्रतीक बता रही है।
🔍 सिंगूर की सीख
सिंगूर आज तीन बातों का प्रतीक है—
1️⃣ आंदोलन से सत्ता परिवर्तन
2️⃣ उद्योग बनाम राजनीति की दुविधा
3️⃣ सत्ता में आने के बाद विकास की हकीकत
सिंगूर यह सवाल छोड़ जाता है कि राजनीति और विकास की लड़ाई में आखिर कीमत किसे चुकानी पड़ती है।




