बलरामपुर : सरगुजा संभाग का सबसे ऊंचा कोटली जलप्रपात बरसात में अपने पूरे निखार व उफान पर

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बलरामपुर, 2 जून (हि.स.)। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में यूं तो अनेक दर्शनीय और पर्यटन स्थल है किन्तु कोटली जलप्रपात की शान कुछ अलग ही है। जिले के डीपाडीह से होकर बहती कन्हर नदी पर बनता यह जलप्रपात अपने अंदर अनेक खूबियां समेटे हुए है। यह प्रपात सरगुजा संभाग का सर्वाधिक ऊंचाई से गिरने वाला जलप्रपात है। कन्हर नदी का वेग यहां पर बहुत तेज है और ढेर सारा जल यहां पर लगभग डेढ़ सौ फीट की ऊंचाई से गर्जना करता हुआ नीचे गिरता है।इन दिनों इस जलप्रपात का सौंदर्य देखते ही बनता है और यह पूरे उफान पर है।

कन्हर नदी शोर मचाती हुई आगे बढ़ जाती है और पीछे छोड़ जाती है घनधोर गर्जना। शोर भी ऐसा कि आसपास दूर तक सुनाई दे। कन्हर नदी यहां पर बारहमासी बहती है लिहाजा झरना भले ही पतली धारा से गिरे लेकिन बारहों महीने यह प्रपात जीवित रहता है और लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

कोटली जलप्रपात के आसपास ढेरो गांव बसे हुए हैं। प्रायः ग्राम आदिवासी बहुल गांव है। यहां आप शुद्ध आदिवासी संस्कृति के दर्शन कर सकते हैं। शाम से देर रात तक आपको नृत्य, गीत, का वाद् की सु-मधुर आवाज सुनाई देगी जो यहां की नीखरता में पूरी लय के साथ तैरती रहती है। कोटली प्रपात का शोर भी इनके साथ अपनी ताल मिलाता हुआ साक्षात होता है। कुल मिलाकर बरसात का मौसम यहां बेहद सुहाना हो जाता है।

कोटली जलप्रपात के दर्शन हेतु आप अम्बिकापुर से राजपुर होते हुए कुसमी मार्ग पर रास्ते में पड़ने वाले डीपाडीह से यहां जा सकते हैं। अम्बिकापुर से इसकी दूरी लगभग 70 किलोमीटर है। इसी प्रकार बिहार झारखंड से बलरामपुर होते हुए राजपुर फिर डीपाडीह पहुंचकर भी जा सकते हैं। एक मार्ग कुसमी से भी यहां के लिए जाती है।

स्थानीय निवासी सुनील किस्पोट्टा की माने तो, कोटली जलप्रपात के करीब ही कुछ किलोमीटर की दूरी पर डीपाडीह मुख्य मार्ग से अन्दर पूरा वैभव के दर्शन होते हैं। नौवीं शताब्दी में यहां शैवकालीन सभ्यता का वास था। यहां दो गर्भगृह वाले शिव मन्दिर के भग्नावशेष आज भी विद्यमान है। और अपनी गौरव गाथा का बखान करते हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग ने प्राचीन धरोहर के रूप में संरक्षित घोषित कर रखा है। इसे राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त है जिसे देखने पर्यटकों का आना जाना लगा रहता है।

बरसात के दिनों में इस झरने का सौन्दर्य कई गुना निखर जाता है। जब आसपास के जंगल, पेड़-पौधे हरियाली की चादर ओढ़ लेते हैं। धरती अपने उपर बिछे-हरे-भरे व्यास पर इतराने लगती है तब कोटली भी प्रकृति का सौन्दर्य गान करते हुए हजारों घनमीटर पानी उछालते हुए गर्जन के साथ आसपास के गांवों को यह सौन्दर्य गाथा सुनाते हुए उन्हें प्रकृति के इस मनोरम दृश्य से एकाकार होने हेतु बुलाती है। तब आप यहां जाएं तो जरूर पर सावधान रहे, क्योंकि तब जितना सुन्दर होता है उतना ही खतरनाक भी।

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