कचरा प्रबंधन संकट: भारत के सामने चुनौती और समाधान की राह

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🔹 बढ़ता कचरा संकट

भारत सहित पूरी दुनिया कचरा प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है।
हवा, पानी और जमीन—तीनों पर इसका असर साफ दिखाई देता है।
यह समस्या न सिर्फ इंसानों बल्कि जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के लिए भी खतरा बन गई है।

भारत में विश्व की लगभग 18% आबादी रहती है, जबकि वैश्विक कचरे में इसकी हिस्सेदारी करीब 12% है।
देश में हर साल लगभग 620 लाख टन कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से बड़ा हिस्सा ठीक से प्रबंधित नहीं हो पाता।


🔹 कचरा प्रबंधन की वर्तमान स्थिति

  • 620 लाख टन में से केवल 430 लाख टन कचरा एकत्रित होता है
  • सिर्फ 120 लाख टन का ही उपचार होता है
  • लगभग 310 लाख टन लैंडफिल में डाल दिया जाता है
  • बाकी कचरा खुले में पड़ा रहता है या जलाया जाता है

खुले में कचरा जलाने से जहरीली गैसें निकलती हैं, जो गंभीर बीमारियों का कारण बनती हैं।


🔹 नए नियम और दिशा-निर्देश

सरकार ने कचरा प्रबंधन को सुधारने के लिए सख्त नियम लागू किए हैं (2026 से प्रभावी):

कचरे का चार श्रेणियों में विभाजन:

  1. गीला कचरा – भोजन, फल, सब्जियां
  2. सूखा कचरा – प्लास्टिक, कागज, धातु
  3. सैनिटरी कचरा – डायपर, नैपकिन
  4. विशेष कचरा – बैटरी, दवाइयां, बल्ब

👉 गीले कचरे से बायोगैस (मीथेन) बनाकर ऊर्जा उत्पादन
👉 सूखे कचरे का रीसाइक्लिंग और ईंधन के रूप में उपयोग
👉 लैंडफिल में केवल अनुपयोगी कचरा ही डालने की अनुमति


🔹 जिम्मेदारी और सख्ती

  • नगर निकाय, पंचायत और स्थानीय प्रशासन जिम्मेदार
  • नियमों का पालन न करने पर दंड का प्रावधान
  • बड़े कचरा उत्पादकों को अपने परिसर में ही निपटान करना होगा
  • केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल से निगरानी

🔹 चुनौतियां अभी भी बरकरार

  • नियमों का कमजोर क्रियान्वयन
  • डेटा और निगरानी की कमी
  • गरीब इलाकों में डंपिंग
  • जागरूकता की कमी

🔹 समाधान की राह

✔ विकेंद्रीकृत कचरा प्रबंधन प्रणाली
✔ पंचायत स्तर तक व्यवस्था
✔ स्कूल और विश्वविद्यालयों में जागरूकता
✔ रिसाइक्लिंग और “वेस्ट टू एनर्जी” पर जोर

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