📌 टिकाऊ निर्माण की दिशा में बड़ी पहल
Indian Institute of Technology Jodhpur ने सतत निर्माण के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। संस्थान ने ऐसी पेटेंट तकनीक विकसित की है, जो कृषि अवशेष और प्लास्टिक कचरे को उच्च गुणवत्ता वाली निर्माण सामग्री में बदलती है।
📌 बायो-ब्रिक्स और एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स
इस शोध का नेतृत्व Dr. Priyabrata Rautray ने किया। टीम ने दो नई सामग्री विकसित की हैं—बायो-ब्रिक्स और एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स। ये सामग्री मटेरियल इंजीनियरिंग और टिकाऊ डिजाइन का अनूठा उदाहरण हैं।
📌 पर्यावरण के अनुकूल तकनीक
बायो-ब्रिक्स धान का पुआल, गेहूं का भूसा और गन्ने के बगास जैसे कृषि अवशेषों से बनाए जाते हैं। इन्हें भट्टों में पकाने की जरूरत नहीं होती, जिससे ऊर्जा की बचत होती है और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होता है। खास बात यह है कि ये ईंटें कार्बन-नेगेटिव हैं, यानी ये वातावरण से अधिक कार्बन अवशोषित करती हैं।
📌 प्लास्टिक कचरे का भी समाधान
एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स तकनीक के जरिए मिश्रित प्लास्टिक कचरे और कृषि अवशेषों को मिलाकर मजबूत निर्माण सामग्री बनाई जाती है। इसमें थर्मल फ्यूजन और कंप्रेशन प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है, जिससे अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक का उपयोग संभव हो पाता है।
📌 वास्तविक परियोजनाओं में उपयोग
इस तकनीक का उपयोग अब वास्तविक निर्माण में भी शुरू हो चुका है। पहला बायो-ब्रिक मॉडल तैयार हो चुका है और आईआईटी परिसर में बायो-ब्रिक आधारित आवास का निर्माण जारी है।
📌 पर्यावरणीय चुनौती का समाधान
भारत में पराली जलाने और प्लास्टिक कचरे की समस्या गंभीर है। ऐसे में यह तकनीक न केवल कचरा प्रबंधन बल्कि जलवायु-अनुकूल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भी महत्वपूर्ण समाधान प्रस्तुत करती है।



