Democracy is governed by constitutional norms, not by political self-interest — Rajiv Jasrotia

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Democracy is governed by constitutional norms, not by political self-interest — Rajiv Jasrotia

राष्ट्र की लोकतांत्रिक परंपरा पर चर्चा करते हुए राजीव जसरोति ने 30 अक्टूबर 2026 को यह स्पष्ट किया कि लोकतंत्र का संचालन केवल राजनीतिक स्वार्थ से नहीं, बल्कि संवैधानिक मानदंडों से होता है। उन्होंने यह बात अपने नवीनतम लेख में इस बात पर जोर देते हुए कही कि लोकतंत्र की स्थिरता के लिए संविधान को प्राथमिक मार्गदर्शक मानना अनिवार्य है। जसरोति के अनुसार, जब राजनीतिक दल अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए संविधान की व्याख्या करते हैं, तो लोकतंत्र का मूल आधार कमजोर पड़ जाता है। इस कथन ने राजनीतिक विश्लेषकों और आम नागरिकों दोनों में गहरी चर्चा पैदा कर दी है।

संविधान: लोकतंत्र का अटल आधार

जसरोति ने बताया कि संविधान न केवल कानूनों का संग्रह है, बल्कि यह एक जीवित दस्तावेज है जो समाज के सभी वर्गों के हितों का संतुलन रखता है। उन्होंने कहा कि संविधान का पालन करने से नीतियों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होती है। इस उपशीर्षक के अंतर्गत उन्होंने उदाहरण के तौर पर 1975 के राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संविधान के उल्लंघन के प्रभावों पर प्रकाश डाला, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि संवैधानिक नियमों का पालन लोकतंत्र को सुरक्षित रखता है।

राजनीतिक स्वार्थ का खतरा

इस भाग में जसरोति ने बताया कि कैसे राजनीतिक दल अक्सर चुनावी लाभ के लिए संविधान की व्याख्या बदलते रहते हैं। उन्होंने बताया कि यह प्रथा न केवल लोकतंत्र के सिद्धांतों को कमजोर करती है, बल्कि जनता के विश्वास को भी क्षीण करती है। उदाहरण के रूप में उन्होंने 2024 के वित्तीय वर्ष में कुछ राजस्व नीतियों की आलोचना की, जहाँ कुछ पार्टियों ने संविधान के मूल्यों को उपेक्षित किया। यह दिखाता है कि जब स्वार्थ प्राथमिकता बनता है, तो लोकतंत्र की नींव पर खतरा मंडराता है।

संविधानिक शिक्षा का महत्व

जसरोति ने संविधानिक शिक्षा पर बल देते हुए कहा कि नागरिकों को संविधान के मूल सिद्धांतों से अवगत कराना अनिवार्य है। उन्होंने सुझाव दिया कि शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में संविधान के इतिहास, उसकी व्याख्याओं और उसके कार्यान्वयन के बारे में गहन अध्ययन शामिल किया जाना चाहिए। इस उपशीर्षक में उन्होंने यह भी बताया कि संविधानिक जागरूकता से नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं और राजनीतिक निर्णयों में सूचित रूप से भाग ले सकते हैं।

लोकतंत्र की मजबूती के लिए कदम

इस खंड में जसरोति ने कुछ ठोस कदमों का प्रस्ताव रखा, जैसे कि संविधान संशोधन प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करना, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बढ़ाना और पारदर्शी चुनावी प्रक्रियाओं को लागू करना। उन्होंने यह भी आग्रह किया कि राजनीतिक दलों को संविधान के प्रति प्रतिबद्धता की गारंटी देने के लिए सख्त नियम लागू किए जाएं। इसके अलावा उन्होंने नागरिक समाज की भूमिका को प्रमुखता से उजागर किया, ताकि वे संविधान के प्रति जागरूकता बढ़ा सकें।

निष्कर्ष

राजीव जसरोति का यह संदेश स्पष्ट करता है कि लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ केवल चुनावी जीत या सत्ता के दावों से नहीं, बल्कि संविधान के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता से परिभाषित होता है। जब राजनीतिक स्वार्थ को नियंत्रित कर संवैधानिक मानदंडों को प्राथमिकता दी जाती है, तभी लोकतंत्र सुदृढ़ और समृद्ध बन सकता है। इस दृष्टिकोण से, समाज के सभी घटक—राजनेता, नागरिक और संस्थान—को मिलकर संविधान के मूल्यों को पुनः स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि भारत का लोकतंत्र आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित और प्रगतिशील बना रहे।