ESA Suicide Mission Satellite: आखिर क्या है यह मिशन?
ESA का यह Suicide Satellite मिशन एक टेस्ट सैटेलाइट है,
जिसकी अनुमानित लागत करीब 27 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
इसका मकसद:
- सैटेलाइट को जानबूझकर पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कराना
- उसकी री-एंट्री (Re-entry) के हर पल को रिकॉर्ड करना
- यह समझना कि
- कौन-से हिस्से जलते हैं
- कौन-से बच जाते हैं
- और धरती तक क्या पहुंचता है
🌍 अंतरिक्ष कचरा: असली समस्या क्या है?
आज अंतरिक्ष में:
- हजारों निष्क्रिय सैटेलाइट्स
- टूटे रॉकेट के हिस्से
- और मलबा (Space Debris)
घूम रहा है।
समस्या यह है कि:
- जब ये धरती पर गिरते हैं
- तो वैज्ञानिकों के पास पुख्ता डेटा नहीं होता
- कि वे कितने खतरनाक हो सकते हैं
ESA का यह मिशन
👉 इसी खतरे को समझने की कोशिश है।
🔥 री-एंट्री का रहस्य क्यों नहीं सुलझ पाया?
अब तक:
- ज़्यादातर सैटेलाइट्स अनियंत्रित तरीके से गिरे
- उनके टूटने या जलने का डेटा अधूरा रहा
- कोई भी मिशन पूरी तरह मॉनिटर नहीं किया गया
इसलिए वैज्ञानिक:
👉 सिर्फ अनुमान लगाते रहे,
लेकिन पक्के सबूत नहीं मिल पाए।
🧪 यह मिशन कैसे करेगा मदद?
इस ‘सुसाइड मिशन’ से:
- सैटेलाइट डिजाइन को ज्यादा सुरक्षित बनाया जा सकेगा
- भविष्य में कंट्रोल्ड री-एंट्री संभव होगी
- धरती पर गिरने वाले मलबे का खतरा घटेगा
- स्पेस लॉ और सेफ्टी पॉलिसी बेहतर बनेगी
यानी:
👉 एक सैटेलाइट की “कुर्बानी”
हजारों जिंदगियां सुरक्षित कर सकती है।
💡 क्यों कहा जा रहा है इसे ‘सुसाइड मिशन’?
क्योंकि:
- यह सैटेलाइट किसी खराबी से नहीं
- बल्कि जानबूझकर
- अपने मिशन के अंत में
- खुद को वायुमंडल में झोंक देगा
इसका लक्ष्य:
👉 खुद को खत्म करना,
ताकि विज्ञान आगे बढ़ सके।
🌌 भविष्य के लिए क्यों अहम है यह प्रयोग?
आने वाले समय में:
- सैटेलाइट्स की संख्या और बढ़ेगी
- स्पेस ट्रैफिक भी बढ़ेगा
अगर री-एंट्री को नहीं समझा गया:
👉 तो खतरा भी बढ़ेगा।
ESA का यह मिशन
अंतरिक्ष को ज्यादा सुरक्षित और जिम्मेदार बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।





