🔹 उम्र 73, हौसला जवान
Rikhi Ram Bamboo Craft Jaswani आज भी परंपरा की मशाल जलाए हुए है। Jaswani (तहसील घुमारवीं, Bilaspur) के 73 वर्षीय रिखी राम रोज सुबह बांस की पतली पट्टियां चीरकर टोकरी, खारे और छड़ोलू तैयार करते हैं।
उनके चेहरे पर उम्र की रेखाएं हैं, पर हाथों की रफ्तार अब भी वैसी ही है। चिंता बस इतनी है कि कहीं उनके साथ यह पारंपरिक कला खत्म न हो जाए।
🔹 लकड़ी से बांस तक का सफर
आठवीं कक्षा में पढ़ाई छोड़ने के बाद रिखी राम ने पास के गांव में काष्ठकला सीखी। शिमला और सिरमौर जैसे पहाड़ी जिलों में उन्होंने लकड़ी के मकान, दरवाजे-खिड़कियां बनाकर पहचान बनाई।
करीब दस साल पहले एक दुर्घटना में हाथ की हड्डी टूटने के बाद भारी लकड़ी का काम छोड़ना पड़ा। तब उन्होंने बांस शिल्प को आजीविका बनाया।
🔹 प्लास्टिक ने बदली तस्वीर
पहले हर घर में बांस की टोकरी और खारे होते थे। अब सस्ते प्लास्टिक उत्पादों ने बाजार छीन लिया है। कच्चा बांस भी अब आसानी से उपलब्ध नहीं होता।
कम मांग और बढ़ती लागत ने इस पारंपरिक पेशे को संकट में डाल दिया है।
🔹 युवाओं की दूरी, पर उम्मीद बाकी
रिखी राम ने अपने बेटे को यह हुनर सिखाया है, लेकिन मानते हैं कि केवल परिवार के प्रयास से कला जीवित नहीं रह सकती।
सरकार की प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना जैसी योजनाएं कुछ उम्मीद जगाती हैं, जिसमें टूल किट के लिए 15 हजार रुपये अनुदान और सस्ती दरों पर ऋण की सुविधा दी जाती है।



