रंग पंचमी पर सजता है खास दरबार
जांजगीर-चांपा जिले के पंतोरा गांव में आयोजन होता है।
डंगाही होली पंतोरा परंपरा लगभग 300 साल पुरानी मानी जाती है।
यह आयोजन उत्तर प्रदेश के Barsana की लट्ठमार होली की याद दिलाता है।
मां भवानी मंदिर से होती है शुरुआत
पूजा के बाद कुंवारी कन्याएं छड़ी उठाती हैं।
सबसे पहले देवी-देवताओं पर प्रतीकात्मक प्रहार किया जाता है।
फिर मंदिर के बाहर पुरुषों पर लाठियां बरसाई जाती हैं।
डंगाही होली पंतोरा परंपरा श्रद्धा से निभाई जाती है।
विशेष बांस की छड़ी का चयन
छड़ियां कोरबा के मड़वारानी जंगल से लाई जाती हैं।
एक वार में कटने वाला बांस शुभ माना जाता है।
छड़ियों को अभिमंत्रित कर कन्याओं को सौंपा जाता है।
बीमारी से रक्षा की मान्यता
ग्रामीण मानते हैं कि छड़ी की मार आशीर्वाद है।
डंगाही होली पंतोरा परंपरा में इसे प्रसाद माना जाता है।
लोग स्वयं आगे बढ़कर मार खाने को तैयार रहते हैं।
पीढ़ी दर पीढ़ी जारी परंपरा
गांव की बुजुर्ग महिलाएं इसकी निरंतरता बताती हैं।
नई पीढ़ी भी पूरे उत्साह से शामिल होती है।
डंगाही होली पंतोरा परंपरा लोक संस्कृति की पहचान बन चुकी है।



