Bhagavad Gita Chapter 7 Meaning: इस श्लोक का असली अर्थ
श्री भगवान् ने कहा —
“हे पृथापुत्र! अब सुनो कि तुम किस तरह मेरी भावना से पूर्ण होकर और मन को मुझमें आसक्त करके योगाभ्यास करते हुए मुझे पूर्णतया संशयरहित जान सकते हो।”
यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 7 की भूमिका है।
इसे ज्ञान-विज्ञान योग कहा जाता है।
🧠 1. “मेरी भावना से पूर्ण होकर” का अर्थ
कृष्ण जी यहां सिर्फ पूजा या कर्मकांड की बात नहीं कर रहे।
इसका अर्थ है:
- हर कर्म में ईश्वर की भावना
- अहंकार का त्याग
- यह समझ कि मैं सिर्फ शरीर नहीं, आत्मा हूं
जब मन ईश्वर-भाव में डूब जाता है, तभी सच्चा ज्ञान जन्म लेता है।
❤️ 2. “मन को मुझमें आसक्त करके” क्यों कहा?
मन भटकने वाला है —
कभी डर, कभी इच्छा, कभी क्रोध।
कृष्ण जी कहते हैं:
👉 मन को स्थिर करो, उसे सत्य से जोड़ो।
यह आसक्ति:
- मोह नहीं है
- बल्कि पूर्ण समर्पण है
यही भक्ति और ध्यान का मूल आधार है।
🧘 3. “योगाभ्यास करते हुए” का वास्तविक अर्थ
योग का मतलब सिर्फ आसन नहीं।
यह है:
- कर्म योग (निष्काम कर्म)
- ज्ञान योग (सही समझ)
- भक्ति योग (समर्पण)
कृष्ण जी बता रहे हैं कि योग के बिना ईश्वर को समझना अधूरा है।
❓ 4. “संशयरहित जान सकते हो” — इतना ज़ोर क्यों?
क्योंकि संदेह:
- ज्ञान को रोकता है
- भक्ति को कमजोर करता है
- मन को अशांत करता है
जब व्यक्ति:
- सुनता है
- समझता है
- अनुभव करता है
तब ईश्वर सिर्फ विश्वास नहीं, अनुभूति बन जाते हैं — और यही संशयरहित ज्ञान है।
🌟 5. आज के जीवन में इसका क्या अर्थ है?
आज के युग में यह श्लोक हमें सिखाता है:
- काम करते हुए भी आध्यात्मिक बना जा सकता है
- मन की शांति बाहर नहीं, भीतर है
- ईश्वर को जानना मतलब खुद को जानना
🕉️ क्यों खास है गीता का अध्याय 7?
- यहीं से कृष्ण अपना संपूर्ण स्वरूप समझाना शुरू करते हैं
- भक्ति और ज्ञान का संतुलन सिखाते हैं
- आम इंसान के लिए अध्यात्म को सरल बनाते हैं
इसीलिए कहा जाता है कि
Bhagavad Gita Chapter 7 Meaning समझ लिया,
तो जीवन की दिशा साफ हो जाती है।





