रोजा: सिर्फ भूखा-प्यासा रहना नहीं
पवित्र महीने Ramadan में रखे जाने वाले रोजे को लेकर कई लोगों की धारणा होती है कि यह सिर्फ खाने-पीने से परहेज है।
लेकिन इस्लामिक शिक्षाओं के अनुसार रोजा दरअसल पूरे शरीर और व्यवहार का अनुशासन है।
यानी रोजा रखते समय इंसान को:
- मुंह (जुबान)
- आंख
- कान
- नाक
- दिल और सोच
सबकी हिफाजत करनी होती है।
क्यों कहा जाता है आंख-नाक-कान का रोजा?
इस्लाम में रोजे का मकसद सिर्फ भूख सहना नहीं, बल्कि तकवा (आत्मिक संयम) हासिल करना है।
इसीलिए माना जाता है कि अगर इंसान गलत चीजें देखे, सुने या बोले — तो रोजे की रूह कमजोर हो जाती है।
रमजान में मुस्लिम लेते हैं ये 5 संकल्प
1️⃣ बुरी बातों और झूठ से परहेज
रोजे के दौरान मुसलमान कोशिश करते हैं कि:
- झूठ न बोलें
- गाली-गलौज न करें
- चुगली और बदजुबानी से दूर रहें
यह जुबान के रोजे का अहम हिस्सा है।
2️⃣ नजर की हिफाजत (आंख का रोजा)
रमजान में गलत या भड़काऊ चीजें देखने से बचना जरूरी माना जाता है।
इसे नजर का रोजा कहा जाता है।
3️⃣ कानों को गलत बातें सुनने से बचाना
इस दौरान:
- चुगली
- गाली
- नकारात्मक बातें
सुनने से बचने की कोशिश की जाती है।
4️⃣ ज्यादा से ज्यादा इबादत का संकल्प
रमजान में मुसलमान:
- नमाज
- कुरान पढ़ना
- दुआ
- जिक्र
ज्यादा करते हैं ताकि आत्मिक शुद्धि हो सके।
5️⃣ सब्र और नेकियों को बढ़ाना
रोजा इंसान को सब्र सिखाता है।
इस महीने में लोग:
- जरूरतमंदों की मदद
- दान-सदका
- अच्छे व्यवहार
पर खास ध्यान देते हैं।
रोजे की असली सीख
रमजान का संदेश सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सेल्फ-कंट्रोल और इंसानियत को मजबूत करना है।
अगर कोई व्यक्ति सिर्फ भूखा रहे लेकिन व्यवहार न बदले, तो रोजे का मकसद अधूरा माना जाता है।




