🔹 विवाद से बदलाव तक
Lenskart का ड्रेस कोड विवाद एक बड़े सामाजिक मुद्दे में बदल गया।
यह मामला सिर्फ कंपनी की नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और कार्यस्थल पर समानता की बहस का कारण बना।
🔹 कैसे शुरू हुआ विवाद
सोशल मीडिया पर एक कथित ड्रेस कोड दस्तावेज वायरल हुआ, जिसमें कुछ धार्मिक प्रतीकों को लेकर असमानता के आरोप लगे।
इससे लोगों में नाराजगी बढ़ी और मामला तेजी से चर्चा में आ गया।
🔹 कंपनी की सफाई
कंपनी के सीईओ पीयूष बंसल ने कहा कि वायरल दस्तावेज पुराना है।
हालांकि, इस स्पष्टीकरण से लोगों का संदेह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
🔹 जनदबाव का असर
लगातार विरोध और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं के बाद कंपनी को अपनी नीति बदलनी पड़ी।
कंपनी ने नई गाइडलाइन जारी कर सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी।
🔹 नई ड्रेस कोड गाइडलाइन
नई नीति के तहत कर्मचारियों को अब अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के साथ काम करने की अनुमति दी गई है।
बिंदी, तिलक, सिंदूर, कड़ा, हिजाब और पगड़ी जैसे प्रतीकों को समान रूप से स्वीकार किया गया है।
साथ ही, पेशेवर माहौल बनाए रखने के लिए कंपनी ड्रेस जैसे टी-शर्ट, जींस और बंद जूते अनिवार्य किए गए हैं।
🔹 भरोसे की चुनौती अभी बाकी
नीति बदलने के बावजूद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा पूरी तरह शांत नहीं हुआ है।
कई लोगों का मानना है कि यह बदलाव दबाव में किया गया है, जिससे भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं हो पाया है।
🔹 क्यों अहम है यह मामला
यह प्रकरण कई अहम सवाल उठाता है—
- कार्यस्थल पर धार्मिक स्वतंत्रता
- समावेशिता (Inclusivity)
- कॉरपोरेट पारदर्शिता
🔹 जनजागृति की ताकत
यह घटना दिखाती है कि आज के दौर में सोशल मीडिया और जागरूक नागरिक बड़ी कंपनियों को भी अपनी नीतियां बदलने पर मजबूर कर सकते हैं।



